मंगलवार, 3 नवंबर 2009

हिंदी पत्रकारिता के नेपोलियन थे विनोद शुक्ल




विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात, यदि मुझे सही ढंग से याद है तो दिलीप शुक्‍ला ने करवाई थी। उन दिनों दिलीप शुक्‍ला आजके कानपुर संस्‍करण में संवाददाता थे तथा विनोद जी आजअखबार के सब कुछ। कहने को वे प्रबंध सम्‍पादक थे पर थे वे अखबार की सांस। चाहे चपरासी रहे हों या मशीनमैन, उप सम्‍पादक या संवाददाता, सभी विनोद जी को खुश देखना चाहते थे। इसीलिए वे जी-जान से काम करते थे और चाहते थे कि विनोद जी उन्‍हें मुस्‍कराकर देखें। यह किसी डर या लोभ की वजह से नहीं होता था बल्कि उस प्‍यार के बदले में होता था, जो उन्‍हें विनोद जी से मिलता था। 
 यह प्‍यार ही विनोद जी की सबसे बड़ी ताकत भी थी। जो एक बार उनसे मिल लिया, उनका ही होकर रह गया। मैं लखनऊ में रविवारका प्रतिनिधित्‍व कर रहा था। आज जो इन पंक्तियों को पढ़ेंगे उनमें से हो सकता है कुछ को न मालुम हो कि रविवारने हिन्‍दी पत्रकारिता में गुणात्‍मक योगदान दिया है। विनोद जी रविवारके प्रशंसकों में थे और मेरे नाम से परिचित थे। जब मिले तो लगा कि सालों पुरानी जान-पहचान है। वैसे यह विनोद जी की खासियत भी थी कि वे किसी को आभास नहीं होने देते कि वे उसे नहीं जानते हैं। 
कानपुर यूं भी आना-जाना होता था क्‍योंकि अस्‍सी के शुरुआती दशक में कानपुर खबरों का केंद्र हुआ करता था। इटावा, बुंदेलखंड और फर्रुखाबाद के त्रिकोण का केंद्र था कानपुर। इटावा में चम्‍बल जहां नेकसे जैसे डाकुओं का वास था, फर्रुखाबाद और मैनपुरी छविराम का कार्यक्षेत्र था तथा बुंदेलखंड में फूलन, विक्रम मल्‍लाह, लाला राम - श्री राम तथा गया कुर्मी की वजह से लोग कांपते रहते थे। मैं जब जाता पहले विनोद जी के पास जाता। विनोद जी चाय या लस्‍सी मंगवाकर, अपने केबिन में दिलीप शुक्ला सहित संबंधित पत्रकारों को बुला लेते। बात शुरू हो जाती और वह मेरे दिमाग में एक नक्‍शा बना जाती। इन सारे इलाकों का मुख्‍य अखबार उन दिनों आजथा, इसलिए स्‍वाभाविक रूप से वह उन दिनों संदर्भ केंद्र का काम करता था।
सबसे ज्‍यादा केंद्र में फूलन थीं, उन्‍हें अखबार दस्‍यु सुंदरी भी  लिखते थे। रविवारके सम्‍पादक सुरेंद्र प्रताप सिंह ने जिम्‍मेदारी सौंपी कि फूलन पर बड़ी रिपोर्ट लिखनी है। फूलन उन दिनो बीहड़ में मशहूर नहीं हुई थी। मैं कई सप्‍ताह तक बीहड़ में पड़ा रहा। जालौन, पंचनदा के जंगलों और गुढ़ा का पुरवा के बीच फिरकनी बन गया और तब कई बार की फिसलन के बाद फूलन से मुलाकात हुई। सारे संसार के सामने फूलन देवी और विक्रम मल्‍लाह की कहानी सामने आई। देश और दुनिया के अखबारों ने उसका अनुवाद किया। किसी ने उसका सहारा लिया तथा कुछ बड़े पत्रकारों ने तो उसमे अपनी कल्‍पना तक मिलाई। विनोद जी ने उस रिपोर्ट के बाद मेरे साथ दिलीप शुक्ला को कहीं भी, कभी भी आने-जाने की छूट दे दी।
जो भी पत्रकार बाहर से आता था, वह पहले विनोद जी से मिलने की कोशिश करता था। आनन्‍द बाजार ग्रुप के पत्रकार तो विनोद जी को अपने ग्रुप के सीनियर की तरह देखते थे। बिना हिचक उनके घर रुक जाना, जो भी मदद हो मांग लेना, उनकी आदत बन गई थी। निर्मल मित्रा, कल्‍याण मुखर्जी तो विनोद जी के परिवार के सदस्‍य हो गए थे। दोनों सम्‍पादक, एसपी सिंह और एमजे अकबर विनोद जी को साधिकार फोन कर देते थे और सूचनायें मांग लेते थे। यही विनोद जी का बड़प्‍पन था, वे अपने अखबार के अलावा भी बाकी सब की भी मदद करते थे। संयोग था कि उन दिनों कानपुर में उनके अलावा कोई नाम नहीं था जिसके पास जाकर कोई बात की जा सकती थी और यह संयोग अंत तक बरकरार रहा। जब विनोद जी लखनऊ आये तो उनके बिना कानपुर सूना हो गया।
पत्रकारिता की दुनिया के वे हलचल भरे साल थे जब विनोद जी कानपुर में थे। बेहमई का हत्‍याकांड तभी हुआ, छविराम की मौत तभी हुई और सबसे बड़ा हादसा हिंदू-सिख दंगा तभी हुआ। इंदिरा जी की मौत और लोगों का पागलपन जो एक दिन के भीतर अपराधियों के हाथ का हथियार बन गया। मैं सबसे पहले दिल्‍ली में दंगे की शुरुआत के दूसरे दिन कानपुर आया, जो-जो देखा उससे दहल गया। विनोद जी के पास गया। विनोद जी बिफरे बैठे थे। सरकार की अक्षमता, अधिकारियों की संलिप्‍तता और और अधिकारियों की शहर पर चली हुकूमत ने उन्‍हें अंदर ही अंदर रुला दिया था। जो उनके अखबार में नहीं छप सका, वह तो बताया ही साथ ही वह भी बताया जो वे छपाना चाहते थे। उन्‍होंने कहा, देश में तुम्‍हीं लिख सकते हो, शहर का अखबार होने की सीमायें हैं। मेरी उन रिपोर्टों ने लोगों को हिला कर रख दिया, पर वे उतनी प्रभावशाली हो ही नहीं पातीं यदि विनोद जी से मेरा संपर्क नहीं होता।
विनोद जी को स्‍वयं नहीं पता था कि वह खुद कितने बड़े संस्‍थान हैं। कानपुर में रहते हुए उन्‍होंने जितने पत्रकार बनाये और जितनों को उन्‍होंने निखारा, वह अपने आप में उदाहरण है। विनोद जी का आज तक सही मूल्‍यांकन हुआ ही नहीं। आजके मालिक शार्दूल विक्रम गुप्‍त उनके भाई जैसे मित्र थे, कुछ ऐसा रिश्ता जिसे भाई और मित्र के बीच में तलाशा जा सकता है। विनोद जी की लोकप्रियता से जलने वालों ने शार्दूल जी व विनोद जी में दूरियां बढ़वानी शुरू कीं। विनोद जी को दैनिक जागरण के नरेंद्र मोहन जी ने अपने यहां आने का आमंत्रण दिया। एक दिन विनोद जी ने इसका जिक्र किया तो मैने कहा कि नरेंद्र मोहन जी की तस्‍वीर बिल्‍कुल अलग है, कैसे काम करेंगे? विनोद जी ने कहा कि उन्‍होंने लखनऊ संस्‍करण पूरा हाथ में देने का वायदा किया है। नरेंद्र मोहन जी ने अपना वायदा निभाया, लेकिन विनम्रता से इतना अवश्‍य कहना चाहूंगा कि जागरण समूह ने भी विनोद जी का पूरा फायदा नहीं उठाया। विनोद शुक्‍ल हिंदी पत्रकारिता के नेपोलियन थे। उनमे नेतृत्‍व की क्षमता थी, वे लोगों में उत्‍साह भर सकते थे, दिशा दे सकते थे। विनोद जी में खबरें सूंघने की अदभुत क्षमता थी। विनोद जी को लक्ष्‍य दे दीजिये, वे उसे प्राप्‍त कर लेते थे पर यदि उन्‍हें लक्ष्‍य कैसे प्राप्‍त करना है, समय-समय पर बताया तो वह अनमने हो जाते थे। विनोद जी के आलस्‍य ने हम सब पर अत्‍याचार किया। उन्‍होंने लिखा नहीं। विनोद जी को पत्रकारिता में बदलाव ने परेशान तो किया ही अगर वे इसे ही सीरियलाइज कर देते तो हिंदी के वे सब, जो विनोद जी का अनुभव जानना चाहते हैं, उन्‍हें धन्‍यवाद देते।


विनोद जी, जब मैं संतोष भारतीय बनने की प्रक्रिया में था, आपकी सहायता, आपकी दी गई सीख, आपके संकेत, आपकी सहायता, आपके प्‍यार, आपके स्‍नेह और भ्रातृत्‍व को कभी भुला नहीं पाऊंगा। वह ऐसा ऋण है जिससे इस जीवन में तो मैं उऋण हो ही नहीं सकता। (लेखक श्री संतोष भारतीय नामचीन पत्रकार हैं। हिंदी पत्रकारिता में चौथी दुनियांउनका सबसे बड़ा कारनामा है। ) 

10 टिप्‍पणियां:

  1. महोदय,
    संतोष भारतीय जी का यह आलेख स्मृति के अलावा इतिहास का भी बोध कराता है । इस प्रकार के लेखों से अतीत की ऐसी कई जानकारियां हासिल होती हैं , जो शायद और कहीं नहीं मिल पाएंगी । इस प्रकार के लेखों को पढ़कर पत्रकारों की नई पीढ़ी किसी भी पत्रकारिता स्कूल में पढ़ाए जानेवाले कचरे से कुछ ज्यादा ही सीख सकेगी । इसीलिए स्व. विनोद जी पर यह श्रृंखला शुरू करने के लिए राजू जी साधुवाद के पात्र हैं । धन्यवाद ।

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  2. शायद आप उन दिनों की बात कह रहे हैं जब आज अखबार मेरे घर पर नियमित रूप से आता था...उस वक्त अखबार के पीछे कौन लोग थे यह तो पता नहीं था, और शायद इसमे रूचि भी नहीं थी, लेकिन खबरों को पढ़ने और समझने की ललक आज ने ही दी थी...पत्रकारिता की धरातल से जुड़ा एक बेहतर आलेख पढ़ने को मिला..राजू जी आपका प्रयास बहुत ही उम्दा है, आगे भी बहुत कुछ पढ़ने के मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.

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  3. santosh ji aapne jo kuchh likha hai usme kintu parantu jaise shabd to sambhav hi nahi hain kyonki swargiy sri vinod ji par jo kuchh likha jayega vah shayad kam hi hoga. Jo sabase achhi bat lagi vah yah ki sri raju ji ne patrakarita ke mahalonovis par jo srinkhala shuru ki hai usase sambhav hai ki patrakarita ke pathikon aur purohiton me manveey chetana ka spandan shuru ho jayen.

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  4. SANTOSH JI APKO BAHUT BDHAYI KI AAP NE BHAIYYA JI KE BARE ME JO LIKHA HAI WO AKSHRANSH SATYA HA.PADHKAR LAGA KI YAHI UNKE PRATI HAM SABHI KI SACCHI SRADHANJALI HAI....

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  5. raju,
    santosh ji ne bhaiya ke vyakititv ka sahi mulyankan kiya hai. meri ichchha hai ptrkarita ke shalaka purush vinod ji pr yadi aaj ke maliko se likhwa sako to aur behtar hoga. is bare me shashi shekhar ji aur satyprakash aasim ji se bhi aagrh kiya ja sakta hai. tumhare blog par santosh bhartiy ji ke likhne ke liye sadhuwad. chomasa jld portal bane yesi mer kamna ha.

    tumhare aawargi ki dino ka sathi-mukund

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  6. सर आपको धन्यवाद। आपने विनोद जी को याद किया. वरना आज कौन यह याद करता है कि उसके खुद के निर्माण में किन-किन लोगों का योगदान, साथ, मार्गदर्शन और मेहनत होती है. आपका लेख आदरणीय विनोद जी को सच्ची श्रद्धांजलि है.
    अशोक, भड़ास4मीडिया

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  7. ye mere liye bahut saubhagya ki baat hai ki mai unke liye kuch bol raha hu . unke ware me kuch bhe bolna sooraj ko diya dikhane ke barabar hai . jo bhe unke kareeb raha hai wo is baat ko bahut acche se samajh sakta hai .

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  8. Raju ji
    SANOSH ji ne Bhaiya yani Vinod Shukla k liye jo likha hai wo nisandeh sach hai, wo Nepoliyan se aage the, humne unk sanidhya mai seekha aur pankh fadfdaye... us mhan yodha ko naman bar bar... aakhiri dino mai kuch dalalon ne unhen bhramit kiya eska afshosh hota hai

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  9. Raju ji,

    Adaraneeya vinod jee ke bare men to jo bhee likha jayega kam hai.Bahut achchha laga apako net par dekh kar ..apaka yah prayas sarahaneeya hai.Meree hardik shubhkamnayen apke is naye manch ke liye.
    Hemant Kumae

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  10. हिंदी पत्रकारिता में दो स्कूलों की चर्चा होती है, काशी और लाहौर। विनोद जी इसके इतर पत्रकारिता का तीसरा स्कूल थे। स्वयं में एक पत्रकारिता संस्थान थे जिसमें पत्रकारिता से संबंधित सभी विधाएं समाहित थीं। यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं कभी उनका दर्शन न कर सका था लेकिन बरेली दैनिक जागरण में काम करते हुए तत्कालीन समाचार संपादक आदरणीय रामधनी द्विवेदी जी से प्रायः शुक्ल जी की चर्चा हुआ करती थी। वे विनोद जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के विविध पहलुओं से अवगत कराते रहते थे। प्रसंग कोई भी हो उसमें विनोद जी की चर्चा अवश्य होती। मसलन वे इस मामले को किस तरह लेते अथवा उनका क्या विचार होता। राजू जी विनोद स्मृति प्रस्तुत करने का आपका आइडिया सराहनीय है। हां, उनके समकालीन लोगों की स्मृतियों से और समृद्ध किया जाना चाहिए। उनके विचार एक रचनाशील पत्रकार को सदैव प्रेरित करते रहेंगे।
    सत्येंद्र, बरेली

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