सोमवार, 7 दिसंबर 2009

सराहें भैया साहब को या सराहें शैलनाथ को



सराहें भैया साहब को या सराहें उनके बेटे को ! आज की भागमभाग भरी जिंदगी में भला किसे और कहां फुर्सत है अपने शहर के बारे में सोचने की। और फुर्सत अगर है भी तो करें क्यों? स्वनामधन्य डा. शैलनाथ चतुर्वेदी अपने शहर के बाबत सोचते ही नहीं बल्कि पूरे मन और दम-खम के साथ उसे कर दिखाते हैं। शहर  की विशेषताओं से लोग परिचित हों, वह गर्व कर सकें कि हम इसी गौरवशाली लखनऊ शहर के वाशिन्दे हैं। हिन्दी वाड्.मय निधि के जरिये उन्होंने शहर-ए-लखनऊ की खूबियों को एक-एक करके पुस्तकाकार देकर न्यूनतम मूल्य में उसे सुलभ कराने का जो बीड़ा उठाया है वह निश्चय  ही प्रशंसा और अभिनन्दन योग्य है। अब तलक 'हमारा लखनऊ पुस्तक माला' के अन्तर्गत 20 पुस्तकों का  प्रकाशन हो चुका है। पुस्तकों के नाम की बानगी -लखनऊ का बंग समाज, लखनऊ के मोहल्ले और उनकी शान, लखनऊ के कश्मीरी पण्डित, लखनऊ -नवाबों से पहले।
हिन्दी हित के चिन्तक और अनन्य हिन्दी सेवी पद्मभूषण पण्डित श्री नारायण चतुर्वेदी के पुत्र शैलनाथ जी गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास के विभागाध्यक्ष रहे। 1994 में सेवानिवृत्त होकर लखनऊ आ गये।  तब से जारी है पिता के सपने को पूरा करने का उनकी कोशिश। भैया साहब के नाम से जग विख्यात पण्डित श्री नारायण जी हिंदी की संवृद्धि कैसे हो, हिंदी कैसे सम्पन्न बने इस निमित्त सदैव व्यग्र रहते थे। उनकी चिंता के दायरे में सामान्य वर्ग के पाठक थे। उन्हें लगता था कि अंग्रेजी में तो प्रत्येक स्तर की पुस्तके मिल जाती हैं, पनडुब्बी -हवाई जहाज से लेकर प्रत्येक वस्तु -विषय पर बड़े-बड़े ग्रंथ तक मिल जाते हैं अंग्रेजी में लेकिन अपनी हिंदी में ऐसा कुछ नहीं। उन्हें खासी उलझन रहती थी  इन बातों को लेकर। 25 हजार रुपये की पूंजी से उन्होंने हिंदी वाड्.मय निधि की स्थापना की। उनकी कल्पना थी कि विविध विषयों पर लेखकों से लिखने का आग्रह जिमायेंगे और उन्हें कुछ पत्र-पुष्प देने के साथ ही प्रकाशक को भी प्रेरित करेंगे। प्रयोग हुआ। कुछ पुस्तकें आई भी लेकिन योजना फलीभूत नहीं हो सकी। रिटायरमेंट के पश्चात अब शैलनाथ जी की जिम्मेदारी थी कि वह निधि का क्या करें। हर पल उनकी चिंता का यही सबब था। बहुत परेशान हुए वह। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि जिस शहर में वह रहते हैं उसके आम-आदमी को कोई जरूरी मालुमात ही नहीं है। लखनऊ में कांग्रेस के कितने अधिवेशन हुए? पहला कहां हुआ? कांग्रेस का एक अध्यक्ष भी हुआ यहां का, पर कोई नाम नहीं बता पायेगा उसका? 2003 में बाबू गंगा प्रसाद वर्मा के बारे में किताब लिखते हुए शैलनाथ जी के मन में विचार उपजा-क्यों न छोटी-छोटी, सस्ती पुस्तकें निकाली जायें। अगले वर्ष उनकी मुलाकात एक महिला से हुई। वह महिला लखनऊ  के बंगाली समुदाय की खास जानकार थी। श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय नाम था उनका। 2005 में उनकी लिखी पहली किताब आई लखनऊ का बंग समाज। यह शैलनाथ जी के विचारों का सूत्रपात था। उन्हें आशंका थी  कि अब गाड़ी कैसे चलेगी? लेकिन समस्याओं का स्वत: हल निकलता गया। लोग मिलते गये और किताबे धकाधक आने लगीं। अब तक बीस किताबे आ चुकी हैं। वीरबल साहनी, लखनऊ के  बाग, 1857 के बाद लखनऊ की लूट और बरबादी, अवध की बेगमें आदि पर तेजी से काम चल रहा है।
शैलनाथ जी कहते हैं मोटी किताबे कोई नहीं पढ़ना चाहता। हर कोई सूचनाएं संक्षेप में चाहता है। उनकी चाहत थी कि किताब का मूल्य कम हो क्योंकि यह कोई धंधा नहीं मिशन था। दस रुपये दाम रखा शुरुआत में, मंशा इतनी ही थी कि बस लागत निकल आये। महंगाई बढ़ने पर दाम 15 रुपये करने पड़े। अब तो कुछ किताबों का दूसरा संस्‍करण निकालने की तैयारी है। लोगों ने इस काम को हाथो-हाथ लिया। लोग पूरा सेट चाहते हैं ताकि किसी अवसर पर उसे भेट करने के काम आ सके। वह कहते हैं कि प्रत्येक नगरवासी में अपने शहर -जिले के लिए दर्द यदि नहीं है तो पैदा किया जाना चाहिए। यही दर्द का नाता नागरिक और नगर को जोड़ने का सूत्र है। ये दर्द तब पैदा होगा जब हम अपने नगर पर गर्व करें, उसकी उन्नति से खुश हों और उसका स्वरूप बिगडे़ तो सात्विक क्रोध प्रकट करें। नगरवासियों और शहर के बीच प्यार का नाता स्थापित करना ही इन किताबों के जरिये हिंदी वाड्.मय निधि का उद्देश्य है। शैलनाथ जी का एक अनुरोध है -आप सभी पुस्तकें अपने घर में रखें, जिससे घर के प्रत्येक सदस्य को अपने शहर का परिचय मिले और वह लगाव महसूस करें। जन्म दिन जैसे विशेष अवसरों पर उपहार अथवा पुरस्कार देने में इन पुस्तकों का उपयोग करे।
77 वर्ष की वय में भी उत्साह और उमंग से लबरेज शैलनाथ जी के व्यक्तित्व में तरुणाई ठाठे मारती है। ऐसे में 'पिता जी ने कहा था'-'पिता जी ऐसा चाहते थे' सरीखे जुमलों के बीच अपने शहर लखनऊ के प्रति उनका कर्तव्य बोध देखते ही बनता है। महत्वाकांक्षा तो सबमें होती है। पोप और शंकराचार्य तक में मगर पण्डित शैलनाथ चतुर्वेदी ऐसे हैं कि काम की चर्चा तो चाहते हैं लेकिन अपने नाम की नहीं। कई किताबों के इस लेखक और अनन्य हिंदी सेवी को साहित्यकार कहवाना भी नहीं सुहाता..'मेरा क्या, ये तो पिताजी ने कहा था।'
व्यक्ति से क्या और कैसे लिखवाना है? शैलनाथ जी बखूबी जानते हैं। बातचीत के दौरान लखनऊ की गलियों की भी चर्चा हुई। जब चलने लगे तो  एक किताब का बयाना उन्होंने हमको दे दिया-'लखनऊ की गलियों पर लिखना है आपको।' मैं उनके आदेशात्मक स्वर को सुनकर हां में सिर हिला देता हूं। अब तो एक समयातंराल बाद फोन की घंटी घनघना उठती है-'क्या हुआ पण्डित जी लखनऊ की गलियों का। कब तक दे रहे हैं।' धन्य थे अनन्य हिंदी सेवी श्रीवर पण्डित नारायण चतुर्वेदी और धन्य है उनके पुत्र पण्डित शैलनाथ चतुर्वेदी की हिंदी उत्थान और शहर की यह निष्‍काम सेवा। - राजू मिश्र

16 टिप्‍पणियां:

  1. सूचनात्मक आलेख के लिए आभार राजू भाई

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  2. शैलनाथ जी का परिचय पाकर अच्छा लगा. आभार.
    (शब्द पुष्टीकरण को बंद कर दें तो अधिक अच्छा रहेगा)

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  3. बहुत बढिया काम कर रहे हैं राजू मिश्रा जी आप। डटे रहिए और थोडा विस्तार कीजिए। व्यक्ति केंद्रित ही नहीं, बहुकेंद्रित मसलों को भी परवान चढाइए। खास कर जो वंचित तबका है,उसे भी उभारिए। साहित्य- संस्कृति पर भी ज़ोर आज़माइए तो मज़ा आएगा।
    -दयानंद पांडेय

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  4. हिन्दी प्रेमी और लखनऊ प्रेमी चतुर्वेदी जी से मुलाकात करवाने के लिए धन्यवाद। चर्तुर्वेदी जी का प्रयास सराहनीय है। राजू भैया लखनऊ से जुड़े और लेख भी छापिए। प्रणाम।

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  5. आपकी पोस्ट के माध्यम से बहुत अच्छी जानकारी मिली है ।धन्यवाद और शुभकामनायें

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  6. ye acchhi baat hai ki lucknow ki galiyo par likha jaaye. kai baar mera man bhi hua ki lucknow ki galiyo par likha jaye. es par kafi kuch likha bhi gaya hai. shailnath ji ke sujhao par mera ek jawabi sujhao bhara agrah hai-pahle LUCKNOW aur RAJDHANI LUCKNOW ke beech ek demarkation kar le. vidambana hai ki rajdhani hone ke karan lucknow ki nai galiyo par ek khichdi sanskrati panap rahi hai aur purani galiyo me gandagi bajbaja rahi hai. yahi ek sawal bhi chhod raha hu aap buddhijiviyon ke liye-100 saal se jyada purani emarton ka ASI sanrachhad kar sakti hai to hum lucknow ki etihasik galiyo me rahne wale log kya etna bhi nahi kar sakten ki nagar nigam par bharosa karne ke bajay ek samiti banakar enme naabdaan ke sath rojana subah bahne wala mal saaf kara de, awaidh kabja kar gali ko chabutare me na mila de, gali ko parking sthal na bana de. mera khyal hai etna hone ke baad agar lucknow ki galiyoa par likha jaye to likhane me bhi maja ayega aur padhne me bhi. kya vichar hai ?

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    Best regards
    Mohit (www.mohitvermablog.com)

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  8. उत्तम कार्य. इस आलेख के लिए आपका धन्यवाद!

    - Sulabh Jaiswal

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  9. राजू जी, मैंने इस श्रृंखला की पुस्तकें देखी हैं। इतने कम लागत पर इन्हें उपलबध कराना किसी आश्चर्य से कम नहीं। इस सराहनीय सेवा के लिए शैलनाथ जी बधाई के पात्र हैं।

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  10. राजू पाईंदाबाद। लगे रहो।

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  11. I think your CHAUMASA creation would be proved mile stone in near future. I have see and read it today. It is realy very nice. Efforts of Shri SHAIL NATH Jee will realy inspire everyone to do something for save the sweet and lovely culture of my beautiful Lucknow. I will greatful to you if you meet me from Shre SHAIL NATH. Today I feel your writing tilant and huge vision about future and our lovely work place Lucknow. God help you in your mission. I am sure You will prove himself as shining star in hindi journalism.

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  12. सच में नमन है ऐसे कर्मठ पुरुष को जो इस वय में भी एक ऐसा काम कर रहें है जिस से उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होने वाला...आज के दौर में ऐसे इंसान मिलना दुर्लभ हैं...इस जानकारी के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद...
    नीरज

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  13. बहुत अच्छी और रोचक जानकारी----।
    हेमन्त कुमार

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  14. aap logon tak jis jankari ko pahuncha rahe hai wah nayab hai aur agar aisi koi pushtak likhenge to ummid hai ki usame se LUCKNOW ki khushboo avashy aayegi.

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